Showing posts with label Kabir. Show all posts
Showing posts with label Kabir. Show all posts
BHAGATO KAR LO EKA,MEGHO KAR LO EKA.
Thursday, June 23, 2011Posted by Prof.Raj kumar Bhagat at 3:14 AM 0 comments
Labels: Bhagat Mahasabha, Kabir, Punjab
भगत महासभा की मढ़ इकाई की ओर से रविवार को कबीर साहिब के निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर मढ़ विधानसभा क्षेत्र से विधायक चौधरी सुख नंदन मुख्य अतिथि थे जबकि भगत महासभा के राष्ट्रीय प्रधान प्रो. राज कुमार भगत अतिथि विशेष थे।
Monday, February 21, 2011मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे....मैं तो हूँ विश्वास में
Friday, January 14, 2011
मेघवंशी स्वयं को वृत्र या मेघ ऋषि का वंशज मानते हैं. मेघ ऋषि के बारे में प्रसिद्ध है कि कपड़ा बनाने की शुरूआत करने वाले मेघऋषि ही थे जैसा कि राजस्थान में माना जाता है और ‘मेघ चालीसा’ में लिखा है. हड़प्पा सभ्यता की जानकारी भी इसे पुष्ट करती है कि उस सभ्यता के लोग कपड़ा बनाने की कला जानते थे. यही लोग आगे चल कर ग़ुलाम बना लिए गए और विभिन्न जातियों, जनजातियों (SC, ST, OBC) आदि में बाँट दिए गए.कबीर भी कपड़ा बनाने वाले परिवार से थे. ऐसा उनकी वाणी में आता है- ‘कहत कबीर कोरी’. कोली-कोरी समाज कपड़ा बनाने का कार्य करता है. हो सकता है कि वे एक ऐसे कोरी परिवार में जन्मे हों जिसने इस्लाम अपनाया हो. वे जुलाहे थे ऐसा तो सभी मानते हैं. यह एक कारण हो सकता है कि मेघवंशी स्वयं को कबीर के साथ जोड़ कर देखते हैं और कई कबीरपंथी ही कहलाना पसंद करते हैं.
ख़ैर. यह श्रद्धा और विश्वास का मामला है. लेकिन अकसर देखा है कि कबीर के जीवन और उससे जुड़े रहस्यों को इतना महत्व दे दिया जाता है कि कबीर का वास्तविक कार्य पृष्ठभूमि में चला जाता है.
वे लहरतारा तालाब के किनारे मिले या गंगा के तट पर इस पर बहस होती है. उनके जन्मदिन के सही निर्धारण पर बिना निष्कर्ष के चर्चा होती है. उनके गुरु कौन थे इस पर विवाद है. वे किसी विधवा ब्राह्मणी की संतान थे या नीरू के ही घर पैदा हुए या कोरी थे इस पर दंगल हो सकता है. वे सीधे प्रकाश से उत्पन्न हुए ऐसा कहा जाता है. वे कमल के फूल पर अवतरित हुए ऐसा चित्रित किया जाता है. यह पूरा का पूरा कबीरपुराण बन जाता है जिसकी वास्तव में कोई आवश्यकता नहीं. यह भटकन है.
कबीर जैसे महापुरुषों को यदि सम्मान देना हो तो उनके दिए ज्ञान पर ध्यान रखना चाहिए. यह देखना चाहिए कि उनका जीवन संघर्ष क्या था. उन्होंने कैसे विचारों को ग्रहण किया जिनसे उन्होंने सामाजिक तथा मानसिक ग़ुलामी पर जीत पाई और अपनी स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया. सामाजिक कुरीतियों को कैसे भेदा. कबीर की वाणी में ऐसी रचनाएँ भी बड़ी संख्या में जोड़ दी गई हैं जो वास्तव में उन्होंने नहीं लिखीं. पुराने इतिहास और साहित्य में ऐसी गड़बड़ी बड़े स्तर पर की जाती रही है ताकि लोग पुराणपंथी बने रहें. पुराणों की कथाएँ और परंपरागत धर्म मानसिक ग़ुलामी को चलाए रखने के लिए हैं. इस बात को कबीर ने भली-भाँति समझा था.
वे लहरतारा तालाब के किनारे मिले या गंगा के तट पर इस पर बहस होती है. उनके जन्मदिन के सही निर्धारण पर बिना निष्कर्ष के चर्चा होती है. उनके गुरु कौन थे इस पर विवाद है. वे किसी विधवा ब्राह्मणी की संतान थे या नीरू के ही घर पैदा हुए या कोरी थे इस पर दंगल हो सकता है. वे सीधे प्रकाश से उत्पन्न हुए ऐसा कहा जाता है. वे कमल के फूल पर अवतरित हुए ऐसा चित्रित किया जाता है. यह पूरा का पूरा कबीरपुराण बन जाता है जिसकी वास्तव में कोई आवश्यकता नहीं. यह भटकन है.
कबीर जैसे महापुरुषों को यदि सम्मान देना हो तो उनके दिए ज्ञान पर ध्यान रखना चाहिए. यह देखना चाहिए कि उनका जीवन संघर्ष क्या था. उन्होंने कैसे विचारों को ग्रहण किया जिनसे उन्होंने सामाजिक तथा मानसिक ग़ुलामी पर जीत पाई और अपनी स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया. सामाजिक कुरीतियों को कैसे भेदा. कबीर की वाणी में ऐसी रचनाएँ भी बड़ी संख्या में जोड़ दी गई हैं जो वास्तव में उन्होंने नहीं लिखीं. पुराने इतिहास और साहित्य में ऐसी गड़बड़ी बड़े स्तर पर की जाती रही है ताकि लोग पुराणपंथी बने रहें. पुराणों की कथाएँ और परंपरागत धर्म मानसिक ग़ुलामी को चलाए रखने के लिए हैं. इस बात को कबीर ने भली-भाँति समझा था.कबीर को सामान्य मानव की भाँति देखा जाए तो वे चतुर ज्ञानी थे. अवतारी पुरुष के रूप में देखना हो तो यह विचार न करें कि उसके माता-पिता, जाति, जन्मस्थान, जन्मदिन, चमत्कार, जीवन संघर्ष आदि क्या थे. उसे अपनी बहुत ऊँची भावना रख कर मानें. उसे सब कुछ देने वाला मानें. ध्यान किसी एक रूप का ही करें. उसका ध्यान करते हुए अपना भाव ऊँचा रखें. उसकी मूर्ति से या स्वरूप से धन-धान्य माँगना हो तो कंजूसी न करें बहुत अधिक माँगें. अपने विकास का उच्चतम स्वरूप मन में चित्रित कर के उसका ध्यान करें, प्रबल चाह करें और अपने विश्वास को दृढ़ रखें. विश्वासं फलदायकं (विश्वास फल देता है).
सभी चित्र गूगल इमेजिज़ से
Linked to MEGHnet
Linked to MEGHnet
Subscribe to:
Posts (Atom)





























